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Madhusala – Bachchan

December 13, 2006 - Posted in Books Posted by:

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Madhusala by Harivansh Rai Bachchan is one of my favourite Hindi poems of all time. Below are a few excerpts from it. You can read the entire thing here.

मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

कभी न सुन पड़ता, ‘इसने, हा, छू दी मेरी हाला’,
कभी न कोई कहता, ‘उसने जूठा कर डाला प्याला’,
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया ‘जानेवाला’,
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

PS: A few spellings may be incorrect but there is only that much a transliterator can do.

3 Comments

KUNAL 8 years ago

MADHUSALA , M A FAN OF D POEM SUNG BY AMITABH BACHAN, BUT M NOT FINDING ITS MP3 VERSION. 4M WHERE I CAN GET???????????

Reply

Goyal 8 years ago

Hi Kunal – I think I might have the Manna De version, but not the Amitabh version. Do let me know if you are interested.

Reply

Vikram Singh 6 years ago

hey ae desh ke logon ki madhusala

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